तमिलनाडु भारत की राजनीति का ऐसा राज्य जहां सालों से सत्ता से दूर हैं राष्ट्रीय पार्टियां

तमिलनाडु भारतीय राजनीति का एक ऐसा राज्य है जहाँ राष्ट्रीय दलों—भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस)—की सीधी सत्ता बहुत लंबे समय से नहीं रही है। अगर इतिहास पर नजर डालें, तो 1967 के बाद से तमिलनाडु में मुख्य रूप से क्षेत्रीय दलों का ही प्रभुत्व रहा है। 1967 में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) ने पहली बार कांग्रेस को हराकर सत्ता हासिल की थी। उसके बाद से आज तक राज्य की राजनीति DMK और अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (AIADMK) के बीच ही घूमती रही है।

कितने सालों से बीजेपी और कांग्रेस की सरकार नहीं है?

कांग्रेस की बात करें तो उसने तमिलनाडु में आखिरी बार 1967 से पहले सत्ता संभाली थी। यानी लगभग 55 से ज्यादा साल हो चुके हैं जब कांग्रेस अपने दम पर वहां सरकार बना सकी थी। बीजेपी तो तमिलनाडु में कभी भी अपने बलबूते सरकार नहीं बना पाई है। वह केवल गठबंधन के जरिए सीमित राजनीतिक उपस्थिति रखती रही है।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि पिछले पाँच दशकों से अधिक समय से तमिलनाडु में राष्ट्रीय दल सत्ता से बाहर हैं और क्षेत्रीय दलों का वर्चस्व बना हुआ है।

क्षेत्रीय दलों के दबदबे के मुख्य कारण

1. द्रविड़ आंदोलन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

तमिलनाडु की राजनीति को समझने के लिए द्रविड़ आंदोलन को समझना जरूरी है। यह आंदोलन 20वीं सदी के शुरुआती दशकों में उभरा, जिसका उद्देश्य सामाजिक न्याय, ब्राह्मणवादी वर्चस्व का विरोध और क्षेत्रीय पहचान को मजबूत करना था। सी. एन. अन्नादुरै और एम. करुणानिधि जैसे नेताओं ने इस विचारधारा को राजनीतिक ताकत में बदल दिया।

इस आंदोलन ने लोगों में “तमिल पहचान” को इतना मजबूत कर दिया कि राष्ट्रीय दलों की तुलना में क्षेत्रीय दल ज्यादा प्रासंगिक लगने लगे।

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