उर्वरकों के संतुलित उपयोग औरजैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए आईसीएआर संस्थानों व केवीके वैज्ञानिकों के साथ बैठक 

जयपुर, । खरीफ— 2026 के दौरान उर्वरकों के संतुलित एवं वैज्ञानिक उपयोग को बढ़ावा देने, जैविक एवं प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित करने तथा रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने के उद्देश्य से कृषि एवं उद्यानिकी विभाग की प्रमुख शासन सचिव  मंजू राजपाल ने पंत कृषि भवन में हाईब्रिड मोड में राज्य स्तरीय बैठक ली।बैठक में प्रमुख शासन सचिव ने कहा कि वर्तमान में राज्य में उर्वरकों का पर्याप्त भंडार उपलब्ध है। इसमें यूरिया 3.76 लाख मीट्रिक टन, डीएपी 83 हजार मीट्रिक टन, एनपीके 66 हजार मीट्रिक टन एवं एसएसपी 1.97 लाख मीट्रिक टन शामिल हैं, जो पिछले वर्ष की तुलना में अधिक है। केन्द्र आगामी खरीफ  के लिए राज्य को 11 लाख मीट्रिक टन यूरिया , 5.10 लाख मीट्रिक टन डीएपी , 4 लाख मीट्रिक टन एसएसपी  एवं 1.50 लाख मीट्रिक टन एनपीके आपूर्ति करेगा। मंजू राजपाल ने कहा कि वर्तमान समय में कृषि को टिकाऊ, लाभकारी एवं पर्यावरण अनुकूल बनाने की दिशा में ठोस प्रयास आवश्यक हैं। इसके लिए उर्वरकों का संतुलित उपयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने निर्देश दिए कि किसानों को नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं पोटाश का संतुलित अनुपात में उपयोग करने के साथ-साथ सूक्ष्म पोषक तत्वों के महत्व के बारे में भी जागरूक किया जाए।

‘धरती माता बचाओ’ अभियान से व्यापक जागरूकता— 

मंजू राजपाल ने बताया कि किसान को उर्वरकों के संतुलित एवं विवेकपूर्ण उपयोग करने, अनुदानित उर्वरकों का औद्योगिक प्रयोग व राज्य से बाहर परिगमन रोकने के उद्देश्य से कृषकों को जागरूक करने के लिए केन्द्र सरकार के  “धरती माता बचाओ अभियान” के तहत ग्राम पंचायत, ब्लॉक एवं जिला स्तर पर अप्रैल माह से अभियान आयोजित किए जाएंगे।

जैविक खेती, प्राकृतिक खेती एवं हरी खाद पर विशेष जोर

उन्होंने रासायनिक उर्वरकों के विकल्प जैसे हरी खाद, कंपोस्ट, देसी खाद, जैविक उर्वरक, फसल चक्र में दलहनी फसलों के उपयोग, फसल अवशेष प्रबंधन, प्राकृतिक व जैविक खेती की विधियों पर जोर देते हुए कहा कि इससे न केवल मिट्टी की उर्वरता में वृद्धि होगी बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान मिलेगा। रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट आ रही है, जिसे रोकना अत्यंत आवश्यक है।

राजपाल ने निर्देश दिए कि सभी विभागीय अधिकारी एवं संस्थाएं समन्वय के साथ जमीनी स्तर पर प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करें ताकि किसानों को उर्वरकों के विवेकपूर्ण उपयोग के लिए प्रेरित किया जा सके और मृदा स्वास्थ्य में सुधार हो। जैविक एवं प्राकृतिक खेती अपनाने से न केवल लागत में कमी आएगी बल्कि पर्यावरण संरक्षण एवं कृषि की दीर्घकालीन स्थिरता भी सुनिश्चित होगी।उन्होंने कहा कि जैविक व प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से 2025–26 में 2 हजार क्लस्टर (50 हेक्टेयर प्रति क्लस्टर) के अनुसार एक लाख हेक्टेयर क्षेत्र में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया गया, जिसमें 2 लाख 50 हजार किसान जुड़े। इसी प्रकार  2026-27 में एक हजार क्लस्टर और एक लाख 25 हजार किसानों को प्राकृतिक खेती से जोड़ा जाएगा। 3 हजार 600 प्रशिक्षित कृषि सखी एवं आत्मा योजना में चिन्हित 10 हजार कृषक मित्रों द्वारा जैविक एवं प्राकृतिक खेती का प्रचार– प्रसार कर किसानों में जागरूकता पैदा की जा रही है। परंपरागत कृषि विकास योजना में वर्ष 2026–27 में एक हजार क्लस्टर के 20 हजार किसानों को जैविक खेती से जोड़ा जाएगा। राजपाल ने अधिकारियों को  किसानों को जागरूक करने के लिए व्यापक स्तर पर कृषक गोष्ठियों, कृषक प्रशिक्षण कार्यक्रमों, रात्रि चौपालों एवं कार्यशालाओं का आयोजन करने , मीडिया के माध्यम से उर्वरकों के संतुलित उपयोग एवं जैविक विकल्पों के बारे में प्रभावी प्रचार-प्रसार करने के निर्देश दिए।

बैठक में कृषि आयुक्त चिन्मयी गोपाल,आत्मा निदेशक  हिरेंद्र कुमार शर्मा, अतिरिक्त निदेशक कृषि (प्रशासन) हुशियार सिंह, अतिरिक्त निदेशक कृषि (विस्तार) एस एस शेखावत, अतिरिक्त निदेशक कृषि (आदान) गोपाल लाल, अतिरिक्त निदेशक कृषि (अनुसंधान) श अजय कुमार पचौरी सहित सभी आईसीएआर संस्थानों के प्रभारी अधिकारी, कृषि विज्ञान केन्द्रों के प्रभारी, कृषि विश्वविद्यालयों के प्रसार शिक्षा निदेशक, खण्डीय अतिरिक्त निदेशक कृषि, संयुक्त निदेशक कृषि (विस्तार) एवं जिला परिषदों के प्रतिनिधियों ने वी सी के माध्यम से भाग लिया।

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